मेरे हर आंसू, हर दर्द को
तुम तक
पहुँचने नहीं दूँगी मैं
वैसे ही जैसे
सागर की लहरें उठती हैं पर नभ को
छू नहीं पातीं
फटती हैं ज्वालाएं पर
वापस धरा पर आ जाती हैं,
तेरे हर दर्द, हर आंसूं को
खुद पर ले सह लूंगी मैं
वैसे ही जैसे
फटते हैं बादल, कड़कती हैं बिजलियाँ
पर नभ को कुछ नहीं होता
सहती रहती है धरती चुपचाप...
तुम तक
पहुँचने नहीं दूँगी मैं
वैसे ही जैसे
सागर की लहरें उठती हैं पर नभ को
छू नहीं पातीं
फटती हैं ज्वालाएं पर
वापस धरा पर आ जाती हैं,
तेरे हर दर्द, हर आंसूं को
खुद पर ले सह लूंगी मैं
वैसे ही जैसे
फटते हैं बादल, कड़कती हैं बिजलियाँ
पर नभ को कुछ नहीं होता
सहती रहती है धरती चुपचाप...
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