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ब्लूज़


तुम कहती हो ये रेजिस्टेंस नहीं ठहर पाता,
हम धीरे धीरे समझौते करने लगते हैं, हम समझदार हो जाते हैं, हम परिस्थितियों में बेहतर फिट होने के लिए इवॉल्व हो जाते हैं। मैं सहमति में कहता हूँ कि सबसे शांतिमय जीवन एक ईमानदार कायर का होता है, हम अपनी अपनी लड़ाइयों से समझौता कर लेते हैं। मुझे नाराज़गी है ख़ुद से मैं ऐसा क्यों कहता हूँ?
कुछ दिनों पहले एक कविता पढ़ी थी, उसके मायने रोज़ ज़ेहन में घूमते रहते हैं। बहुत ढूंढा आज पर मिली नहीं। उसमें कवि कहता है कि धीरे धीरे बिना तकलीफ के होती है आत्मा की मृत्यु हमारे भीतर, बिना किसी चीख के।
मुझे यह तकलीफ बचानी है अपने भीतर। नहीं होना मुझे मैच्योर। अब यह कविता जितनी बार गूंजती है भीतर, उतना ही यह लगता है कि अब मेरे जीवन का मक़सद इस कविता को गलत साबित करना होता जा रहा है।
मैं बचाऊँगा अपनी सारी लड़ाइयाँ। अपने दर्द को अपने साथ इवॉल्व करूँगा, उसके साथ जीऊँगा, इतना गहन बनाऊँगा कि जब मृत्यु आए तब जीने की इच्छा सबसे ताकतवर हो।
मैंने एक फ़िल्म देखी - 'थ्री बिल्बोर्डस'। उसमें एक माँ अपने दर्द को बचाने के लिए जूझती है सबसे। एक पुलिस अधिकारी अपने दर्द का पूरा हिस्सा पाने की कोशिश में गोली मार लेता है खुद को। एक दूसरा पुलिस अधिकारी जब अपने छिपाए, संजोए दर्द को एम्ब्रेस करता है तो बदल जाता है बिल्कुल। कोई 'मूव ऑन' नहीं करता। सबकी कहानियाँ देखके पता चलता है कैसे हमारा जीवन प्यार और दर्द के बीच गुंथा हुआ है। हम सब दो लड़ाइयाँ लड़ते हैं - या तो अपने दर्द के लिए दुनिया से, परिस्थितियों से, या दुनिया की बात मानकर, सीखकर समझदार होकर अपने दर्द से।
मैं बचाऊँगा अपनी लड़ाइयाँ, अपना रेजिस्टेंस, अपना दर्द! पर मैं इस सवाल से डरता हूँ कि क्या मैं सचमुच बचा पाऊँगा?

Thursday, 15 March 2018




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