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यादें साल भर


बीतते वर्ष की कितनी बातें
फिर यादें ही बन जाती हैं
और नई पुरानी यादों में
इक होड़ सी ठन जाती है

ठिठुरती पूस की रातों में
कोई झबरा जब सो जाता है
ख्वाबों के खेत जल जाते हैं
होरी ठगा रह जाता है

माघ के कोमल मौसम का
फूल कोई जो खिलता है
कतरा कोई आर्द्र ह्रदय का
आँखों को जा मिलता है

फागुन की रसधार में
हुड़दंगी गलियां बजती हैं
फिर सुर्ख गुलाबी, लाल, हरी
सतरंगी यादें सजती हैं

चैत में पेड़ों के दामन में
मंजरियाँ जो भर आती हैं
कोयल भी अपनी कूक में
धुन यादों की गाती है

वैशाखी के आने तक जो
फसलें ख्वाबों की कटती हैं
शेष ह्रदय में मिल जाती हैं
यादों की जड़ें कब मिटती हैं

जेठ की तपती दोपहरी में
शीतलता जब चुकती है
यादों की कोई बिछड़ी टुकड़ी
सूरज को जा ढकती है

आषाढ़ की गर्मी से बेकल
हवा जो घूमने चलती है
सपनो के संदेशे सी
यादों से जा मिलती है

सावन की भीगी शामों में
जब पलकें बोझिल होती हैं
बूंदों के आँचल में छुपी
तब यादें झिलमिल होती हैं

इन काली अँधेरी रातों में
भादो की बरसातों में
कोई मेघ गरज सा जाता है
कोई दर्द बरस सा जाता है

क्वार के इस बेरंग मौसम में
यादें ही तो ठहरती हैं
खोजबीन कर रंग वो बिसरे
ख्वाबों में फिर भरती हैं

त्योहारों के कार्तिक में जब
दीप चहुँ ओर जलते हैं
कोने में जमे से दर्द पुराने
बूँद बूँद कर गलते हैं

अगहन के पीले खेतों में
अलसी भी अलसाती है
बढ़ती रातों की घटती यादें
काटने दौड़ी आती हैं

आखिरी दिनों की यादों सा
सूरज भी ढल सा जाता है
कांपते मन के इस मौसम में
कुछ रह रह खल सा जाता है

Tuesday, 30 December 2014




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