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हवाएँ . .
मेरी डायरी में
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एक चिट्ठी गाँधी के नाम
A letter to Gandhi
गाँधी,
Monday, 30 January 2017
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उम्मीद
पार्क की उस बेंच के नीचे एक कोने पर दूब उग आई थी.
Wednesday, 18 January 2017
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एक बेतुकी सी प्रेम कहानी
प्रेम कहानी और वह भी बेतुकी सी. ज़िन्दगी अक्सर बेतुकी बातों में ही अपने छंद संजो जाती है, जिन्हें पाने के लिए हम कितने ही प्रयत्न करते रह...
रात
फ़र्ज़ कीजिए कि आप गिर रहे हों एक अंतहीन खाई में
आवाजें..
वे किस्से सुनाती हैं अंधेरों के बिखरने की रौशनी के रेशे उधेड़ कर देखती हैं अनगिनत बंद दरवाज़े पागलों सी आवाजें कौन आवाजें? आवाजें..
मैं खुद को तोड़ता मरोड़ता फिर से बनाता हूँ..
बचपन से जो कुछ भी सीखा है और दुनिया ने सिखाया है उस ज्ञान को भुलाना चाहता हूँ और इसी चाहत में मैं खुद से रोज़ इक जंग लड़कर हार ...
इंतज़ार
"अहा! तुम लौट आए." "लौटा तो हूँ, पर ठहरूँगा नहीं."
ब्लूज़
तुम कहती हो ये रेजिस्टेंस नहीं ठहर पाता,
एक चिट्ठी गाँधी के नाम
A letter to Gandhi गाँधी,
फिलॉसफर
लहरों का बनना, बिगड़ना, आना, और वापस लौट जाना धीरज को उलझाये हुए था. उसने अपनी नज़र घुमाई तो देखा कि वाणी सामने की ओर देख रही है. मुग्ध, स्थि...
पत्थर
तुमने जो
देखो ना
1. मेरे तकिए तले हौले से उग आया है कुछ तुम्हारी याद शायद रह गई है
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एक बेतुकी सी प्रेम कहानी
प्रेम कहानी और वह भी बेतुकी सी. ज़िन्दगी अक्सर बेतुकी बातों में ही अपने छंद संजो जाती है, जिन्हें पाने के लिए हम कितने ही प्रयत्न करते रह...
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फ़र्ज़ कीजिए कि आप गिर रहे हों एक अंतहीन खाई में
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वे किस्से सुनाती हैं अंधेरों के बिखरने की रौशनी के रेशे उधेड़ कर देखती हैं अनगिनत बंद दरवाज़े पागलों सी आवाजें कौन आवाजें? आवाजें..
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